कृषि विज्ञान केंद्र रायगढ़ ने नावापारा में किया आधुनिक फसल अवशेष प्रबंधन तकनीक का प्रदर्शन

मिट्टी में बढ़ेगा जैविक कार्बन, कम होगी रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता

रायगढ़, 4 जून 2026/ फसल कटाई के बाद खेतों में बचने वाले अवशेषों को जलाने की परंपरा से किसानों को बाहर निकालकर वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों से जोड़ने की दिशा में कृषि विज्ञान केंद्र रायगढ़ ने महत्वपूर्ण पहल की है। केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. बी.एस. राजपूत के मार्गदर्शन में निकरा परियोजना के अंतर्गत जिले के अंगीकृत ग्राम नावापारा में “मल्चर एवं तोता हल आधारित फसल अवशेषों के इन-सीटू प्रबंधन” तकनीक का सफल प्रदर्शन किया गया। यह प्रदर्शन ग्राम के प्रगतिशील कृषक होमेश्वर पटेल, तेजराम पटेल एवं रूपचंद पटेल के खेतों में आयोजित किया गया, जहां बड़ी संख्या में किसानों ने प्रत्यक्ष रूप से आधुनिक तकनीक का अवलोकन किया और इसके लाभों की जानकारी प्राप्त की। कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों को फसल अवशेषों के वैज्ञानिक प्रबंधन के प्रति जागरूक करना, मृदा स्वास्थ्य को बेहतर बनाना तथा खेती को अधिक लाभकारी और पर्यावरण-अनुकूल बनाना था।
प्रदर्शन के दौरान मक्का फसल की कटाई के 5 से 7 दिन बाद खेतों में बचे डंठलों एवं अन्य फसल अवशेषों को ट्रैक्टर चालित मल्चर मशीन की सहायता से छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर पूरे खेत में समान रूप से फैलाया गया। इसके बाद ट्रैक्टर संचालित तोता हल के माध्यम से जुताई कर इन अवशेषों को मिट्टी की ऊपरी परतों में समाहित किया गया। किसानों को बताया गया कि यह तकनीक फसल अवशेषों को जलाने का प्रभावी विकल्प है, जो खेती और पर्यावरण दोनों के लिए लाभकारी सिद्ध हो रही है।
कृषि विशेषज्ञों ने बताया कि जब मल्चर द्वारा काटे गए फसल अवशेष मिट्टी में मिल जाते हैं, तो वे धीरे-धीरे सूक्ष्मजीवों की क्रियाओं से विघटित होकर जैविक पदार्थ में परिवर्तित हो जाते हैं। इससे मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ती है, जो भूमि की उर्वरता का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। इसके साथ ही मिट्टी की जलधारण क्षमता, संरचना एवं पोषक तत्वों को सुरक्षित रखने की क्षमता में भी उल्लेखनीय सुधार होता है। विशेषज्ञों के अनुसार फसल अवशेषों में मौजूद नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश एवं अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व पुनः मिट्टी में वापस पहुंच जाते हैं, जिससे फसलों को प्राकृतिक रूप से पोषण मिलता है। इससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है और खेती की लागत में भी कमी आती है। लंबे समय तक इस तकनीक को अपनाने से भूमि की उत्पादकता और गुणवत्ता में स्थायी सुधार संभव है।
कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्र रायगढ़ के वैज्ञानिक (उद्यानिकी) डॉ. के.एल. पटेल ने किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन, मृदा स्वास्थ्य संरक्षण तथा आधुनिक कृषि यंत्रों के महत्व पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि फसल अवशेषों को जलाने से न केवल मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है, बल्कि वायु प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भी वृद्धि होती है। इसके विपरीत इन-सीटू प्रबंधन तकनीक अपनाकर किसान पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ बेहतर उत्पादन भी प्राप्त कर सकते हैं। वहीं वरिष्ठ अनुसंधान सहायक मनोज कुमार साहू ने मल्चर तकनीक के संचालन, उपयोगिता तथा खेत स्तर पर इसके व्यावहारिक लाभों की जानकारी दी। उन्होंने किसानों को बताया कि यह तकनीक आगामी फसल की बुवाई के लिए खेत तैयार करने में भी अत्यंत उपयोगी है और इससे भूमि की भौतिक एवं जैविक गुणवत्ता में निरंतर सुधार होता है।
कार्यक्रम में ग्राम नावापारा के अनेक किसानों ने सक्रिय सहभागिता करते हुए तकनीक से संबंधित विभिन्न प्रश्न पूछे और विशेषज्ञों से मार्गदर्शन प्राप्त किया। किसानों ने इस तकनीक को व्यवहारिक, कम लागत वाली और भविष्य की टिकाऊ खेती के लिए उपयोगी बताते हुए इसे अपनाने में रुचि दिखाई। कृषि विज्ञान केंद्र रायगढ़ द्वारा किसानों को आधुनिक, लाभकारी एवं पर्यावरण-अनुकूल कृषि तकनीकों से जोड़ने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान फसल अवशेषों को जलाने के बजाय वैज्ञानिक तरीके से खेत में उपयोग करना शुरू करें, तो इससे न केवल मिट्टी का स्वास्थ्य बेहतर होगा बल्कि कृषि उत्पादन, आय और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे।

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