रायगढ़ – – वर्ली आर्ट भारत की एक पारंपरिक लोककला है, जिसकी उत्पत्ति महाराष्ट्र की वर्ली जनजाति से हुई है। बच्चों को इस कला से परिचित कराना एक रोचक और रचनात्मक गतिविधि है। इसके माध्यम से बच्चों की कल्पनाशक्ति, एकाग्रता और चित्र बनाने की क्षमता का विकास होता है। यह कहना है शिक्षिका रीता श्रीवास्तव का। उन्होंने बताया कि
बच्चों को सबसे पहले वर्ली आर्ट के बारे में सरल भाषा में बताया जाता है। इसके बाद उन्हें गोल, त्रिकोण, चौकोर और सीधी रेखाओं की सहायता से चित्र बनाना सिखाया जाता है। इस कला में मनुष्य की आकृतियाँ बनाने के लिए दो त्रिकोणों का प्रयोग किया जाता है। बच्चे नृत्य करते हुए लोगों, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, सूर्य, चंद्रमा और गाँव के दृश्यों के चित्र बनाते हैं। वहीं
शिक्षिका रीता श्रीवास्तव ने गोवर्धनपुर विद्यालय के बच्चों को सफेद रंग और भूरे या काले रंग के कागज का उपयोग करके एवम ब्लेक बोर्ड पर चित्र बनाना सिखाती हैं । बच्चे अपनी कल्पना के अनुसार सुंदर चित्र तैयार करते हैं। इस गतिविधि से बच्चों में रचनात्मकता, धैर्य, रंगों की समझ और सांस्कृतिक विरासत के प्रति सम्मान की भावना विकसित होती है। वर्ली आर्ट बच्चों के लिए केवल चित्रकला नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और परंपराओं को जानने का एक सुंदर माध्यम भी है। यह गतिविधि बच्चों को आनंदपूर्वक सीखने और अपनी कला को प्रदर्शित करने का अवसर प्रदान करती है।
शिक्षिका रीता श्रीवास्तव ने बच्चों को सिखाया वर्ली आर्ट

